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गुड़ी पड़वा चैत्र मास की शुक्ल प्रतिप्रदा को मनाया जाता है। इस दिन हिन्दुओं का नया साल प्रारंभ होता है। चैत नवरात्र के प्रारंभ दिन से गुड़ी पड़वा मनाया जाता है। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में गुड़ी पड़़वा को उगादि और महाराष्ट्र मे गुड़ी पड़वा मनाया जाता है।
ऐसी मान्यता है कि श्रीराम ने बाली का वध किया था तो इसी खुशी मे गुड़ी या ध्वज गाड़ा था। इसलिए यह पर्व मनाया जाता है। इसी दिन महाभारत में युधिष्ठिर का राज्यारोहण हुआ था। लेकिन सबसे ज्यादा मत यह है कि इस दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी ।नवीन सरंचना का निर्माण किया। चैत्र मास मे कोमल और नवीन पत्ते और टहनियां निकलती हैं और उसी तरह हमारे अंदर भी आलस का त्याग होता है।
महाराष्ट्र में गुड़ु पड़वा बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है और पूरन पोली बनाने की परंपरा है। अनेक तरह के वयंजन बनाकर उत्साह मनाते है। गुड़ी को तेल और हल्दी लगाकर उसके ऊपर तांबे या सोने का कलश रखकर रेशमी वस्त्र पहनाने की परंपरा है।
दरवाजे को आम के पत्ते के तोलन से सजाया जाता है। कोई भी शुभ कार्य को इस दिन से शुरू करना बहुत शुभ माना जाता है। पूरे भारत में नूतन वर्ष के आगमन का लोग स्वागत करते हैं। गुड़ु पड़वा का लोग कुछ इस तरह स्वागत करते हैं। आफिस हो या स्कूल कालेज हो इस दिन ही अच्छे काम की शुरुआत की जाती है।
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